
दुनिया का कड़वा सच: आपकी कीमत तब तक है, जब तक आप काम के हैं
(The Philosophy of Utility: A Deep Dive into Conditional Relationships)
मुखौटों का बाजार
आज की इस भागदौड़ भरी दुनिया में, जहाँ हर चीज़ की एक कीमत है, क्या इंसान की अपनी कोई स्वतंत्र वैल्यू बची है? यह एक ऐसा सवाल है जो आधी रात को हमारे ज़हन में तब कौंधता है जब हम खुद को भीड़ में भी अकेला पाते हैं। ‘सोच दुनिया की’ (sochduniyaki.com) पर आज हम किसी सतही विषय पर बात नहीं करेंगे। आज हम उस गहरे जख्म को कुरेदेंगे जिसे समाज ‘रिश्ता’ कहता है, लेकिन असल में वह एक ‘सौदा’ है।
सच्चाई कड़वी है: लोग आपकी कद्र तब तक करते हैं, जब तक आप उनके लिए उपयोगी हैं। जिस दिन आपकी उपयोगिता (Utility) समाप्त हुई, उसी दिन से आपकी उपस्थिति एक बोझ बनने लगती है। आइए इस दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक चक्रव्यूह की परतों को खोलते हैं।
1. उपयोगितावाद का दर्शन (The Philosophy of Utilitarianism)
दार्शनिक जेरेमी बेंथम और जॉन स्टुअर्ट मिल ने ‘उपयोगितावाद’ का सिद्धांत दिया था, जिसका मूल मंत्र था—”अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख।” लेकिन सामाजिक संदर्भ में, इस सिद्धांत ने एक विकृत रूप ले लिया है। अब व्यक्ति एक ‘चेतना’ नहीं, बल्कि एक ‘संसाधन’ (Resource) बन गया है।
जब हम किसी से मिलते हैं, तो हमारा अवचेतन मन (Subconscious mind) तुरंत गणना करने लगता है: “यह व्यक्ति मेरे किस काम आ सकता है?”
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क्या इसके पास पैसा है?
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क्या इसके पास पावर है?
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क्या यह मुझे भावनात्मक सहारा दे सकता है?
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क्या इसके साथ दिखने से मेरी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी?
यदि इनमें से किसी भी सवाल का जवाब ‘हाँ’ है, तो हम उस व्यक्ति को ‘महत्व’ देना शुरू करते हैं। यह ‘महत्व’ उस व्यक्ति का नहीं, बल्कि उससे मिलने वाले ‘लाभ’ का होता है।
2. ‘कंडीशनल लव’ का मनोविज्ञान: शर्तों की बेड़ियाँ
मनोविज्ञान कहता है कि अधिकांश मानवीय रिश्ते ‘Conditional’ यानी शर्तों पर आधारित होते हैं। बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि अगर हम अच्छे नंबर लाएंगे, तो हमें प्यार मिलेगा; अगर हम चुप रहेंगे, तो हम ‘अच्छे बच्चे’ कहलाएंगे। यहीं से हमारे भीतर यह बात बैठ जाती है कि प्यार कमाना पड़ता है (Love has to be earned).
व्यस्क होने पर, यह व्यवहार हमारे हर रिश्ते में झलकने लगता है। पति-पत्नी, मित्र, और यहाँ तक कि सगे संबंधियों के बीच भी एक अदृश्य ‘लेन-देन’ चलता रहता है। जब तक एक पक्ष दूसरे की जरूरतों को पूरा कर रहा है, तब तक “रिश्ता बहुत गहरा है।” लेकिन जैसे ही वित्तीय संकट आता है या स्वास्थ्य खराब होता है, उन रिश्तों की नींव डगमगाने लगती है। इसे दार्शनिक भाषा में ‘Fragile Solidarity’ कहा जाता है।
3. कॉर्पोरेट संस्कृति और मानवीय मूल्य का ह्रास
आज के युग में इंसान की तुलना ‘सॉफ्टवेयर’ से की जाती है। जब तक सॉफ्टवेयर अपडेटेड है और काम कर रहा है, वह सिस्टम का हिस्सा है। जिस दिन वह ‘क्रैश’ हुआ या ‘आउटडेटेड’ हुआ, उसे अनइंस्टॉल कर दिया जाता है।
कंपनियाँ ‘Human Resources’ शब्द का इस्तेमाल करती हैं। ध्यान दें—’Human’ के साथ ‘Resource’ (संसाधन) जुड़ा है। संसाधन वह है जिसका दोहन किया जाए। यह सोच धीरे-धीरे दफ्तरों से निकलकर हमारे ड्राइंग रूम तक पहुँच गई है। आज हम अपने दोस्तों को भी उनकी नेटवर्किंग वैल्यू के आधार पर चुनते हैं। हम उन लोगों के साथ उठना-बैठना पसंद करते हैं जो हमारे करियर की सीढ़ी बन सकें।
4. मार्क्सवादी दृष्टिकोण: इंसान एक ‘कमोडिटी’ (Commodity)
कार्ल मार्क्स ने ‘एलियनेशन’ (Alienation) के सिद्धांत में बताया था कि पूंजीवादी समाज में इंसान खुद से और दूसरों से कट जाता है। वह केवल एक वस्तु बन जाता है। जब समाज आपको एक वस्तु की तरह देखने लगता है, तो आपकी भावनाएं, आपकी कला और आपके विचार गौण हो जाते हैं। मुख्य चीज़ यह रह जाती है कि आपकी ‘मार्केट वैल्यू’ क्या है?
यदि आप एक सफल डॉक्टर, इंजीनियर या प्रभावशाली व्यक्ति हैं, तो आपके घर में मेहमानों की लाइन लगी रहेगी। लेकिन यदि आप एक असफल कलाकार हैं जो समाज को कुछ ‘ठोस’ नहीं दे पा रहा, तो आपकी उपस्थिति को नज़रअंदाज़ कर दिया जाएगा। यह समाज का वह चेहरा है जो हम अक्सर देखना नहीं चाहते।
5. डिजिटल युग में उपयोगिता: लाइक्स और वैलिडेशन
सोशल मीडिया ने इस ‘उपयोगिता’ के खेल को और भी खतरनाक बना दिया है। आज आपकी वैल्यू आपके ‘फॉलोअर्स’ और ‘लाइक्स’ से तय होती है। लोग आपसे इसलिए जुड़ते हैं क्योंकि आपकी डिजिटल प्रेजेंस (Digital Presence) उन्हें एक कूल इमेज देती है।
इसे ‘Social Currency’ कहा जाता है। अगर आप वायरल हैं, तो हर कोई आपका दोस्त है। अगर आप शांत हैं और डिजिटल शोर से दूर हैं, तो आप अप्रासंगिक (Irrelevant) हैं। क्या यह डरावना नहीं है कि हमारी साख अब एल्गोरिदम तय कर रहे हैं?
6. जब उपयोगिता खत्म होती है: उपेक्षा का दौर
इस लेख का सबसे गहरा हिस्सा वह है जब हम उस स्थिति की कल्पना करते हैं जब हम ‘काम के नहीं रहते’। सेवानिवृत्ति (Retirement) के बाद के अकेलेपन को देखें, या उन माता-पिता को देखें जिनके बच्चे अब सेटल हो चुके हैं।
जब तक माता-पिता बच्चों की परवरिश कर रहे थे, वे ‘उपयोगी’ थे। जैसे ही बच्चे आत्मनिर्भर हुए, कई मामलों में माता-पिता की राय और उनकी मौजूदगी की अहमियत कम होने लगती है। यह इस बात का सबसे क्रूर प्रमाण है कि समाज केवल ‘सक्रिय योगदान’ को सलाम करता है।
7. दार्शनिक समाधान: ‘होने’ का उत्सव (The Joy of Being)
तो क्या इस स्वार्थी दुनिया में जीने का कोई और तरीका है? महान भारतीय दार्शनिकों और सूफी संतों ने हमेशा ‘निस्वार्थ’ होने की बात कही है। लेकिन यह केवल दूसरे की तरफ से नहीं, बल्कि खुद की तरफ से भी होनी चाहिए।
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स्वयं को पहचानें: अपनी वैल्यू को अपनी उपलब्धियों या दूसरों की राय से न जोड़ें। आप एक ब्रह्मांडीय घटना हैं। आपकी सांसें ही आपकी कीमत हैं।
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सच्चे रिश्तों की पहचान: जो व्यक्ति आपकी कमजोरी के समय आपके साथ खड़ा है, वही असल में आपसे जुड़ा है। बाकी सब केवल आपकी ‘छाया’ के साथ चल रहे थे, आपसे नहीं।
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उपयोगिता के जाल से बाहर निकलें: कभी-कभी बिना किसी उद्देश्य के किसी की मदद करें। बिना किसी स्वार्थ के किसी से मिलें। यह आपके भीतर के उस इंसान को जीवित रखेगा जिसे समाज मार देना चाहता है।
दुनिया आपको एक ‘टूल’ (औज़ार) की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करेगी। यह आप पर निर्भर करता है कि आप एक औज़ार बनकर रहना चाहते हैं या एक स्वतंत्र चेतना।
समाज का सम्मान अस्थायी है, क्योंकि वह आपकी ‘उपयोगिता’ पर टिका है। लेकिन आत्म-सम्मान स्थायी है, क्योंकि वह आपके ‘अस्तित्व’ पर टिका है। जिस दिन आप यह समझ जाएंगे कि आपको किसी की नजरों में ‘उपयोगी’ सिद्ध होने की जरूरत नहीं है, उस दिन आप सही मायने में स्वतंत्र हो जाएंगे।
क्या हम सिर्फ एक साधन हैं?
अंततः, यह जीवन एक रंगमंच है जहाँ हर कोई अपना स्वार्थ साध रहा है। लेकिन इस स्वार्थ के बीच भी, कुछ ऐसी भावनाएं होती हैं जो उपयोगिता की सीमाओं को तोड़ देती हैं। बुद्ध, सुकरात और कबीर जैसे महापुरुषों ने हमें यही सिखाया कि असली मूल्य ‘देने’ में नहीं, बल्कि ‘होने’ में है।
अगली बार जब कोई आपको महत्व दे, तो रुककर सोचें—क्या वह आपको महत्व दे रहा है, या आपकी कुर्सी को? आपकी शख्सियत को, या आपकी सफलता को? जब आप इन दोनों के बीच का अंतर समझ जाएंगे, तो आपको दुनिया की कड़वी सच्चाई से नफरत नहीं होगी, बल्कि आप इसे एक खेल की तरह समझ पाएंगे।
रिश्ते बनाएँ, सौदे नहीं। क्योंकि सौदे अक्सर बाज़ार गिरने पर टूट जाया करते हैं, लेकिन सच्चे रिश्ते हर मौसम में साथ निभाते हैं।
