करियर बनाम शादी: क्यों हर बार चुनाव सिर्फ लड़की को ही करना पड़ता है?

(एक दर्द जो मुस्कान के पीछे छिपा रहता है)

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1. लड़की के सपनों की उम्र तय होती है, लड़के के सपनों की नहीं

इस समाज में एक अनकही लाइन है —

लड़का बड़ा हो रहा है तो “भविष्य बना रहा है”,

और लड़की बड़ी हो रही है तो “शादी की उम्र पहुँच रही है।”

 

जैसे लड़की इंसान नहीं होती, एक ज़िम्मेदारी होती है।

जैसे उसके सपनों पर एक टाइमर लगा होता है —

“इस तारीख से पहले सब पूरे कर लो… वरना शादी से पहले क्या करोगी?”

 

हर लड़की के दिल में यह सवाल चुपचाप धड़कता रहता है:

 

“मेरे सपनों की समय सीमा क्यों है?”

 

2. जब लड़की उड़ना शुरू करती है, लोग उसके पंख तौलने लगते हैं

 

लड़की पढ़े, काम करे — सबको अच्छा लगता है।

लेकिन जैसे ही वो अपनी पहचान बनाना शुरू करती है,

समाज डरने लगता है।

 

“इतनी नौकरी करने की क्या ज़रूरत है?”

“ज़्यादा कमाने से रिश्तों में दिक्कत आती है।”

“लड़की जितनी बढ़ेगी, शादी उतनी मुश्किल होगी।”

उसे उड़ते देख कर किसी को गर्व नहीं होता,

बस डर होता है —

कहीं उसका आकाश हमारे नियमों से बड़ा न हो जाए।

 

3. शादी के बाद करियर करने का वादा सबसे बड़ा झूठ है

 

कितनी ही लड़कियों को घर वाले कहते हैं:

“पहले शादी कर लो, करियर बाद में भी कर लोगी।”

लेकिन यहीं से असली संघर्ष शुरू होता है।

शादी के बाद करियर का मतलब होता है—

अनुमति लेकर काम करना

समय देखकर सपने बुनना

घर और ऑफिस के बीच रोज़ पिसना

और हर रात अपने कमज़ोर होते सपनों को चुपचाप सहलाना

शादी के बाद लड़की का हर सपनों पर एक नाम लिख दिया जाता है:

“बहू की जिम्मेदारी।”

करियर फिर उसका अपना नहीं रहता,

एक समझौता बन जाता है।

 

4. लड़के से कभी नहीं पूछा जाता: “करियर या शादी?”

 

कभी किसी लड़के को ये पूछते सुना है?

“तुम करियर बनाओगे या शादी करोगे?”

“शादी के बाद नौकरी बंद कर दोगे?”

“घर-गृहस्थी संभालोगे या ऑफिस जाओगे?”

 

लड़को को ये अधिकार दिया जाता है कि वो अपने सपनों का पीछा करे।

पर लड़की…

 

उसे हर मोड़ पर दो रास्तों में से एक चुनने को कहा जाता है —

और दोनों रास्तों पर उसकी खुशी का कोई रास्ता नहीं होता।

 

5. लड़की यदि करियर चुने तो लोग उसे कठोर, स्वार्थी और अभिमानी बता देते हैं

 

अगर लड़की कह दे कि उसे शादी नहीं करनी,

उसे अपने सपनों पर फोकस करना है…

तो समाज उसे तुरंत एक टैग दे देता है:

“इगोिस्टिक”

“घर की परवाह नहीं”

“लड़कियों को जितना पढ़ा दो, उतना सिर चढ़ जाती हैं”

 

 

लेकिन क्या किसी ने पूछा है—

 

उसके भीतर कितनी लड़ाइयाँ चल रही हैं?

कितने सपने उसने पहले ही दबा दिए हैं?

कितनी रातें उसने रोकर बिताई हैं?

 

6. सबसे बड़ा दर्द — उसके सपने ‘बाद में’ वाले बॉक्स में डाल दिए जाते हैं

 

लड़की चाहे डॉक्टर बने, इंजीनियर, राइटर या बिज़नेसवुमन…

एक समय आता है जब उसे कह दिया जाता है:

 

“ये सब बाद में भी हो जाएगा… पहले शादी।”

 

लेकिन कोई नहीं समझता—

सपने ‘बाद में’ नहीं, ‘अभी’ पूरे होते हैं।

सपने उम्र देखकर नहीं उगते।

सपने जिम्मेदारियों से नहीं डरते…

पर जिम्मेदारियाँ ज़रूर सपनों को डरा देती हैं।

 

लड़की की ज़िंदगी दो टोकरी बन जाती है—

एक उसके सपनों की,

दूसरी उसकी जिम्मेदारियों की…

और हर कोई उसे कहता है कि

जिम्मेदारियाँ भारी हैं, सपने हल्के।

 

7. असली सच: लड़कियाँ चुनाव नहीं करना चाहतीं… उन्हें मजबूर किया जाता है

 

लड़की भी चाहती है—

 

करियर

 

शादी

 

सम्मान

 

संतुलन

 

और अपनी पहचान

 

 

पर उसे कहा जाता है—

“दोनों नहीं हो सकते।”

 

यह समाज नहीं समझता…

सपने काटे नहीं जाते, सपने बाँटे जाते हैं।

लेकिन लड़की को अपने सपने आधे करने पड़ते हैं,

ताकि किसी का अहंकार पूरा हो सके।

 

लड़की को नहीं चुनना चाहिए — उसे चुनने दिया जाना चाहिए

 

करियर और शादी दोनों खूबसूरत हो सकते हैं…

लेकिन दोनों तभी खूबसूरत हैं जब लड़की को अपनी इच्छा से चुनने दिया जाए।

जब उसकी उड़ान पर पहरेदार न हों,

जब उसके सपनों पर जिम्मेदारियों की जंजीरें न हों।

 

लड़की को चुनाव नहीं चाहिए…

उसे आज़ादी चाहिए।

उसे अपना जीवन खुद लिखने का अधिकार चाहिए।

उसे ये नहीं सुनना चाहिए कि “अब उम्र हो रही है”…

उसे सुनना चाहिए—

“तुझे जो करना है, कर… हम तेरे साथ हैं।”

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